संदेश

Raksha Bandhan Poem by Late Mr. Abdul Kalam (Former President of India and a great Scientist)

Sisterly love is like a full moon in glow Soft yet soothing and fine-tunes the mood Brotherly love is blooming sun Brightens the life and protects homes Merging the minds lights up the homes Nobility in thoughts. May you live long.
Two Verses from Gitanjali by Gurudev Rabindranath Tagore XXXV Where the mind is without fear and the head is held high; Where knowledge is free; Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls; Where words come out from the depth of truth; Where tireless striving stretches its arms towards perfection; Where the clear stream of reason has not lost its way into dreary desert sand of dead habit; Where the mind is led forward by thee into everwidening thought and action- Into the heaven of freedom, my father, let my country awake. XXXVI This is my prayer to thee, my lord - strike, strike at the root of penury in my heart. Give me the strength lightly to bear my joys and sorrows. Give me the strength to make my love fruitful in service. Give me the strength never to disown the poor or bend my knees before insolent might. Give me the strength to raise my mind above daily trifles. And give me the strength to surrender my strength to thy w...

कुछ तो लोग कहेंगे...

राहुल देव बर्मन के संगीत से सजी और आनंद बख्शी की कलम से लिखी फिल्म अमर प्रेम के इस गीत का हमसे बड़ा ही गहरा नाता है। हमलोग कहने और सुनाने में उस्ताद हैं..कुछ करने में नहीं,क्यों..क्योंकि कुछ तो लोग कहेंगे...लोगों का काम है कहना..करना नहीं...कुछ करेंगे तो फिर बहुतों की सुननी पड़ेगी,बहुत कम ही होंगे जो आपके मन की कहेंगे और बहुत सारे होंगे जो अपने मन की कहकर आपके मन को व्यथित करेंगे लेकिन शुरुआत में ही बड़े प्यार से कह देंगे..बुरा मत मानना...। कुछ ढीठ किस्म के लोग तो इस औपचारिकता को भी नहीं निभाएंगे बस कह देंगे.. मौके-बेमौके.. बिना लाग-लपेट...ऐसे महान लोगों के सानिध्य में ज्यादा दिन रहने और इन्हें ज्यादा दिन झेलने के बाद आपकी सहनशीलता का कोटा बहुत जल्द एक्सपायरी डेट पर पहुंच सकता है और बहुत जल्दी आप भी बिना मखमल लपेटे लोगों को जूता मारने की हिंसक कला में प्रवीण होने लगते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है..साफगोईपसंद लोग 'साफ दिलवाले' होने का दंभ भरते नहीं थकते तो फिर विनम्रता के साथ शब्दकोष को खंगाल कर सबसे मीठे लगने वाले व्यंगबाण चुनकर निशाना साधने वालों को अपनी मेहनत बेमतलब नजर आने ...

क्या जवाब देना जरूरी है...

क्या जवाब देना जरूरी है... अगर कोई अापके मन की न कहे  और अपने मन की जी भर कर आपको सुनाए तो क्या जवाब देना जरूरी है... बिना राग-द्वेष  आपके मुंह से निकली बात का बतंगड़ बनाए  और फिर सारा इल्जाम आप पर लगाए, तो क्या जवाब देना जरूरी है... आपके एक तीर के बदले सौ वार कर जाए और फिर हमले की शुरूआत का ठीकरा  आपके सिर पर फोड़, खुद को बेकसूर बताए तो क्या जवाब देना जरूरी है..  वो आपका हमदर्द बन आपको सौ बात सुनाए,  पर जब आप उन्हें अपना दोस्त मान  उनसे दिल्लगी करें और वो इसे दिल से लगाएं तो क्या जवाब देना जरूरी है...

शब्दों की इस मायानगरी में संवाद के कुछ तार बुनने

कभी कभी लगता है जैसे लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूं लेकिन विचार शब्दों की सीमा में बंधने से इंकार कर देते हैं। मन में उठते विचारों का आवेग आकाश में मंडराते काले घने बादलों की याद दिलाता हैं जो गरजते तो हैं लेकिन बरसने से इंकार कर देते हैं। क्या लिखूं...कैसे लिखूं...और क्यों लिखूं...ऐसा क्या है जो पहले लिखा नहीं गया...क्या है जिसे पहले पढ़ा नहीं गया...इसमें नवीन क्या है...इसकी सार्थकता क्या है और इसकी प्रासांगिकता क्या है...ऐसे तमाम विचार लेखन के मार्ग पर बढ़ रहे मन की गति को विराम लगा देते हैं...लेकिन ये बावरा मन भला किसी सवाल-जवाब की परवाह कहां करता है...एक बार जो ठान ली तो बस उसे पूरा करके ही मानेगा। बस इसी मान-मनौव्वल में लिखती जा रही हूं। बहुत पहले शुरू हुई मेरी खुद से मिलने की तलाश अब भी जारी है...बीच में संवाद-परिसंवाद का क्रम बाधित हो गया था या यूं कहें आहत से हटकर अनाहत की श्रेणी में चला गया था। पर अब एक बार फिर लौट आई हूं शब्दों की इस मायानगरी में संवाद के कुछ तार बुनने।

Social media: Opportunity and challenges for corporates

Social media: Opportunity and challenges for corporates   Print and electronic media no longer dominates the communication business. Now social media has taken centre stage. This radical change in media and communication industry sets new rules and new technology giant organizations have emerged like google, Facebook, twitter, linked-in and many more. Consumer behaviour has changed and smartphone and apps became the tool of quick, interactive social instruments of communications.   Social media usages have gone up significantly with the increased penetration of smart phones. New technology friendly companies have started leveraging social media platforms for B2B and B2C interactions. More and more companies are planning to use mobile apps to manage supply chain, real time sales report and predictive analysis. Many companies are using Facebook pages, like and comments for sentiment analysis to improve customer satisfaction. The real challenge for corporates would be to integrat...

सोच में तो नहीं पड़ गए जनाब...

लंबे समय बाद टूट गई हड़ताल। शुरु हो गई भागमभाग और फिर से शुरु हो गई कलाकारों के नखरे दिखाने, वक्त की कमी होने का रोना रोने, कैमरा देखकर इठलाने और फिर बड़ी ही अदा के साथ भाव बढ़ाकर बातें करने का सिलसिला। बनावटी दुनिया के बनावटी रंग देखिए टीवी चैनल्स के संग संग। कभी कभी लगता है जिस रुपहले पर्दे की रुपहली दुनिया हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी को लुभाती है वो कितनी बदरंग है। लेकिन जिनको ये पसंद है उनकी पसंद के लिए इसे अपनी पसंद बनाना और फिर इसे उनकी पसंद के लायक बनाकर पेश करना, कितना नापसंद है हम जैसे लोगों को जो हर चीज को तर्क और उपयोगिता की कसौटी पर कसने को मानो बेकरार रहते हैं। सच ही कहा है किसी ने कभी कभी ज्यादा सोचने से चीजें इतनी उलझ जाती है कि उसे सुलझाते सुलझाते पूरी जिंदगी ही गुजर जाती है। लेकिन इस कमबख्त दिमाग का क्या करुं जो कइयों से कमअक्ल होने के बावजूद खुद को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद मानकर हर पल कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है। कहीं ये सब पढ़कर आप भी तो सोच में नहीं पड़ ...