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सोच में तो नहीं पड़ गए जनाब...

लंबे समय बाद टूट गई हड़ताल। शुरु हो गई भागमभाग और फिर से शुरु हो गई कलाकारों के नखरे दिखाने, वक्त की कमी होने का रोना रोने, कैमरा देखकर इठलाने और फिर बड़ी ही अदा के साथ भाव बढ़ाकर बातें करने का सिलसिला। बनावटी दुनिया के बनावटी रंग देखिए टीवी चैनल्स के संग संग। कभी कभी लगता है जिस रुपहले पर्दे की रुपहली दुनिया हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी को लुभाती है वो कितनी बदरंग है। लेकिन जिनको ये पसंद है उनकी पसंद के लिए इसे अपनी पसंद बनाना और फिर इसे उनकी पसंद के लायक बनाकर पेश करना, कितना नापसंद है हम जैसे लोगों को जो हर चीज को तर्क और उपयोगिता की कसौटी पर कसने को मानो बेकरार रहते हैं। सच ही कहा है किसी ने कभी कभी ज्यादा सोचने से चीजें इतनी उलझ जाती है कि उसे सुलझाते सुलझाते पूरी जिंदगी ही गुजर जाती है। लेकिन इस कमबख्त दिमाग का क्या करुं जो कइयों से कमअक्ल होने के बावजूद खुद को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद मानकर हर पल कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है। कहीं ये सब पढ़कर आप भी तो सोच में नहीं पड़ ...