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सोच में तो नहीं पड़ गए जनाब...

लंबे समय बाद टूट गई हड़ताल। शुरु हो गई भागमभाग और फिर से शुरु हो गई कलाकारों के नखरे दिखाने, वक्त की कमी होने का रोना रोने, कैमरा देखकर इठलाने और फिर बड़ी ही अदा के साथ भाव बढ़ाकर बातें करने का सिलसिला। बनावटी दुनिया के बनावटी रंग देखिए टीवी चैनल्स के संग संग। कभी कभी लगता है जिस रुपहले पर्दे की रुपहली दुनिया हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी को लुभाती है वो कितनी बदरंग है। लेकिन जिनको ये पसंद है उनकी पसंद के लिए इसे अपनी पसंद बनाना और फिर इसे उनकी पसंद के लायक बनाकर पेश करना, कितना नापसंद है हम जैसे लोगों को जो हर चीज को तर्क और उपयोगिता की कसौटी पर कसने को मानो बेकरार रहते हैं। सच ही कहा है किसी ने कभी कभी ज्यादा सोचने से चीजें इतनी उलझ जाती है कि उसे सुलझाते सुलझाते पूरी जिंदगी ही गुजर जाती है। लेकिन इस कमबख्त दिमाग का क्या करुं जो कइयों से कमअक्ल होने के बावजूद खुद को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद मानकर हर पल कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है। कहीं ये सब पढ़कर आप भी तो सोच में नहीं पड़ ...

महिमा मीडिया की

लिपे-पुते चमकदार चेहरे, जगमगाती पोशाकों में सजे- धजे कुछ नामी-गिरामी लोग, जहां से गुजरे...कैमरे की फ्लैश चमकने लगती है और इनके चेहरे पर खिल जाती है एक लंबी सी.... मुस्कान। मुस्कान बिल्कुल नपी-तुली। इतना कि सामने वाला खुश हो जाए और भीतर का दर्द या कभी कभी ऊब या गुस्सा बाहर ना झांकने पाए। ये है ग्लैमर वर्ल्ड की अद्भुत कला। इस महान कला की विरासत को संभालने वाले भी महान ही होते हैं..। सचमुच...चेहरे पर चेहरा लगाना आसान तो बिल्कुल नहीं और इस ऊपर वाले मुखौटे को ही पब्लिक के सामने सही साबित करते रहने की लगातार कोशिश ही तो इन्हें महान लोगों की क्षेणी में शामिल करता है। लेकिन महान सिर्फ ये लोग ही नहीं...। इन्हें महानता की क्षेणी में पहुंचाने वाले भी तो महान ही होते हैं। मनोरंजन की दुनिया के लाइट... कैमरा...एक्शन के पीछे के लोग और इन सबसे ऊपर ''मीडिया "...जिसके बिना सब सूना सूना ही रहता है। आखिर पब्लिसिटी की होड़ में दौड़ती-हांफती एक्टर्स की पूरी जमात का सरमाएदार तो मीडिया ही है। मीडिया से कन्नी काटने वाले भी जानते हैं कि वक्त आने पर उन्हें भी इनकी शरण में जाना ही पड़ेगा या फिर उन्...