संदेश

2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या जवाब देना जरूरी है...

क्या जवाब देना जरूरी है... अगर कोई अापके मन की न कहे  और अपने मन की जी भर कर आपको सुनाए तो क्या जवाब देना जरूरी है... बिना राग-द्वेष  आपके मुंह से निकली बात का बतंगड़ बनाए  और फिर सारा इल्जाम आप पर लगाए, तो क्या जवाब देना जरूरी है... आपके एक तीर के बदले सौ वार कर जाए और फिर हमले की शुरूआत का ठीकरा  आपके सिर पर फोड़, खुद को बेकसूर बताए तो क्या जवाब देना जरूरी है..  वो आपका हमदर्द बन आपको सौ बात सुनाए,  पर जब आप उन्हें अपना दोस्त मान  उनसे दिल्लगी करें और वो इसे दिल से लगाएं तो क्या जवाब देना जरूरी है...

शब्दों की इस मायानगरी में संवाद के कुछ तार बुनने

कभी कभी लगता है जैसे लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूं लेकिन विचार शब्दों की सीमा में बंधने से इंकार कर देते हैं। मन में उठते विचारों का आवेग आकाश में मंडराते काले घने बादलों की याद दिलाता हैं जो गरजते तो हैं लेकिन बरसने से इंकार कर देते हैं। क्या लिखूं...कैसे लिखूं...और क्यों लिखूं...ऐसा क्या है जो पहले लिखा नहीं गया...क्या है जिसे पहले पढ़ा नहीं गया...इसमें नवीन क्या है...इसकी सार्थकता क्या है और इसकी प्रासांगिकता क्या है...ऐसे तमाम विचार लेखन के मार्ग पर बढ़ रहे मन की गति को विराम लगा देते हैं...लेकिन ये बावरा मन भला किसी सवाल-जवाब की परवाह कहां करता है...एक बार जो ठान ली तो बस उसे पूरा करके ही मानेगा। बस इसी मान-मनौव्वल में लिखती जा रही हूं। बहुत पहले शुरू हुई मेरी खुद से मिलने की तलाश अब भी जारी है...बीच में संवाद-परिसंवाद का क्रम बाधित हो गया था या यूं कहें आहत से हटकर अनाहत की श्रेणी में चला गया था। पर अब एक बार फिर लौट आई हूं शब्दों की इस मायानगरी में संवाद के कुछ तार बुनने।