महिमा मीडिया की
लिपे-पुते चमकदार चेहरे, जगमगाती पोशाकों में सजे- धजे कुछ नामी-गिरामी लोग, जहां से गुजरे...कैमरे की फ्लैश चमकने लगती है और इनके चेहरे पर खिल जाती है एक लंबी सी.... मुस्कान। मुस्कान बिल्कुल नपी-तुली। इतना कि सामने वाला खुश हो जाए और भीतर का दर्द या कभी कभी ऊब या गुस्सा बाहर ना झांकने पाए। ये है ग्लैमर वर्ल्ड की अद्भुत कला। इस महान कला की विरासत को संभालने वाले भी महान ही होते हैं..। सचमुच...चेहरे पर चेहरा लगाना आसान तो बिल्कुल नहीं और इस ऊपर वाले मुखौटे को ही पब्लिक के सामने सही साबित करते रहने की लगातार कोशिश ही तो इन्हें महान लोगों की क्षेणी में शामिल करता है। लेकिन महान सिर्फ ये लोग ही नहीं...। इन्हें महानता की क्षेणी में पहुंचाने वाले भी तो महान ही होते हैं। मनोरंजन की दुनिया के लाइट... कैमरा...एक्शन के पीछे के लोग और इन सबसे ऊपर ''मीडिया "...जिसके बिना सब सूना सूना ही रहता है। आखिर पब्लिसिटी की होड़ में दौड़ती-हांफती एक्टर्स की पूरी जमात का सरमाएदार तो मीडिया ही है। मीडिया से कन्नी काटने वाले भी जानते हैं कि वक्त आने पर उन्हें भी इनकी शरण में जाना ही पड़ेगा या फिर उन्हें प्रेमपूर्वक बुलावा भेजना पड़ेगा। ऐसे मौकों पर ही तो मीडिया को अपनी अहमियत का अहसास होता है। वरना तो विकल्पों की बढ़ती भीड़ में एक अदद बाइट के लिए गिड़गिड़ाती मीडिया की औकात तो हर आने वाले चैनल के साथ कम होती जा रही है और यही इन एक्टर्स की दिनोंदिन बढ़ती अकड़ की वजह भी बनती जा रही है। लेकिन जब इनकी गाढ़ी कमाई और महत्वाकांक्षा दांव पर हो तो ये बड़ी ही चतुराई से अपना पैंतरा बदल कर अचानक ही बड़े मीडिया फ्रेंडली बन जाते हैं। आखिर यही तो है मीडिया की तथाकथित ताकत। क्या मीडिया ताकतवर है......(इस बात की तलाश फिलहाल जारी है....)
टिप्पणियाँ
दर्शकों पर इल्ज़ाम यह कि वे यही सब देखना चाहते हैं। दिनभर की उलझनों का मारा आम आदमी शाम को थोड़ा मनोरंजन तो चाहेगा ही। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आप भी अपनी जिम्मेदारी भूलकर पूँजीवादी गिद्ध-दृष्टि से उसके मानस पटल पर कूड़ा और गंदगी बिखेरते रहें। एक बार आजमा कर तो देखिए, अच्छे कार्यक्रम भी आपको खाने-पीने भर का पैसा दे ही देंगे। बल्कि रोज-रोज टी.आर.पी. की मारामारी में ट्रेण्ड बदलने का टेन्शन भी जाता रहेगा। एकाध चैनेल तो तमीज़दार कार्यक्रम दिखाने भी लगे हैं। भले ही वे सबसे आगे न हों लेकिन क्या वे भूखों मर रहे हैं?
दर्शकों पर इल्ज़ाम यह कि वे यही सब देखना चाहते हैं। दिनभर की उलझनों का मारा आम आदमी शाम को थोड़ा मनोरंजन तो चाहेगा ही। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आप भी अपनी जिम्मेदारी भूलकर पूँजीवादी गिद्ध-दृष्टि से उसके मानस पटल पर कूड़ा और गंदगी बिखेरते रहें। एक बार आजमा कर तो देखिए, अच्छे कार्यक्रम भी आपको खाने-पीने भर का पैसा दे ही देंगे। बल्कि रोज-रोज टी.आर.पी. की मारामारी में ट्रेण्ड बदलने का टेन्शन भी जाता रहेगा। एकाध चैनेल तो तमीज़दार कार्यक्रम दिखाने भी लगे हैं। भले ही वे सबसे आगे न हों लेकिन क्या वे भूखों मर रहे हैं?
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